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दादुर का दर्द

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दादुर कहे आज उदर मे बड़ी उथल पुथल है,,,,, पत्तों पे लेटा टमी थामे दादुर बड़ा व्याकुल है,,,,,,,, नैना सातवे आसमान पर ख्यालों मे झूल है ,,,,,,, तन-बदन,अंग-अंग सारा यौवन बड़ा शिथिल है,,,,,, बदरिया गरजे आवाजों की शंक्नाद पल-पल है ,,,,,, ऐसा प्रतीत हो रहा जैसे लूज़ मोशन की पहल है,,,,,,,,,, करवटों पे करवटें जिंदगी बस जल-थल,जल-थल है ,,,,,,,, हरा-भरा संसार हो रहा जैसे निगाहों मे धुल-धूमिल है ,,,,,,,,,, प्राण पखेरू कब उड़ जाए जहनो-जिया मे बड़ी हलचल है ,,,,,,,, साँसों को साँसों से लगता जैसे ट्रेफिक जाम की दखल है,,,,,,,,, चहरे पे डर-खौफ,भय-भ्रम और कंगालों-सी शकल है ,,,,,,,, कहे दादुर दीनहीन अब मौत ही मेरी बस मंजिल है,,,,,,,,,