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Showing posts with the label hindi kavita kosh

कोका कोला से मछलियों को खट्टे डकार आते है

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                                                                                                                       आसमाँ से हल्का हनीमून टपकता है ,                                    फिर भी धरती पे प्यासा शराबी है क्यूँ ?                                  ...

महज चेचिस पर ही झुर्रियों ने ली अंगड़ाई है

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महज चेचिस पर ही झुर्रियों ने ली अंगड़ाई है महज हाड़-मांस में ही कल-पुर्जों की हुई घिसाई है बाखुदा मोहब्बत तो आज भी कतरे-कतरे में उफान पर है इस नामुराद जमाने ने हम पे बुड़ापे की सिल लगाईं है यूँ तो तज़ुर्बा जवानी का बेशुमार रहा इस ख़ादिम को यूँ तो हुस्न की अनारकलियों ने दिलो-जान से चाहा इस सलीम को लेकिन अब इन बदनों की हवस से दिलों की हुई रुसवाई है हम अपने इश्क की मिसाल क्या दे तुमको ऐ जहां वालों हम अपने हुनर को कैसे सोंप दे तुमको ऐ जहां वालों डूबकर किया है इश्क ये मुलाक़ात उसी की सच्चाई है !

सोचने का अंदाज़ बदलो,बस

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सोचने का अंदाज़ बदलो दुनिया बदल जायेगी शुलों को गुलों में बदलते चलो मंजिल खुद दोड़ी चली आएगी दुश्मन को भी दोस्त बनाते चलो दोस्ती की मिसाल बड़ जायेगी सोचने का अंदाज़ बदलो दुनिया बदल जायेगी लहरों से दिल लगाते चलो समंदर से पहचान बड़ जायेगी आसमानों में ख़ुशी के दीप जलाते चलो अंधेरों की घटा छट जायेगी सोचने का अंदाज़ बदलो दुनिया बदल जायेगी गुरुओं की शरण में समाते चलो ज्ञान की गंगा बड़ जायेगी माँ-बाप की सेवा करते चलो जन्नत नसीबों में छा जायेगी सोचने का अंदाज़ बदलो दुनिया बदल जायेगी बच्चों पे प्रेम लुटाते चलो खुदा से रूबरू रूह हो जायेगी दिन-दुखियों का दर्द मिटाते चलो दुवाओं से झोली भर जायेगी सोचने का अंदाज़ बदलो दुनिया बदल जायेगी मीठा गीत कोई गाते चलो गले की खराश मिट जायेगी हर इम्तहान में आत्मविश्वास जगाते चलो मेहनत जरुर रंग लाएगी सोचने का अंदाज़ बदलो दुनिया बदल जायेगी निगाहों में ख्वाब कोई सजाते चलो सुबह से मिलने हकीकत बेशक आएगी हर पल एक हाथ नया मिलाते चलो सारी कायनात आघोष में सिमट आएगी सोचने का अंदाज़ बदलो दुनिया बदल जायेगी !

दर्द का बाज़ार है,ज़ख्मो का व्यापार है

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दर्द का बाज़ार है ,ज़ख्मो का व्यापार है बहते खून पसीने का मोल क्या यहाँ ? शराबों में डूबा हुआ गुले गुलजार है | रखैलों ने इज्जत का जिम्मा उठाया है देखो भरी महफिलों में तन-बदन लुटाया है देखो| धर्मो की धज्जियां उड़ा रहे है पाखंडी और रंडी के मजे ले रहे है शाणे शिखंडी गरीबों को ना मिरिंडा मिल रहा है ना हंडी और बड़े भाव खा रही है भारतीय मण्डी लावारिस,लावारिस ही भटक रहा है देश का संविधान जाने कहाँ लटक रहा है खुलेआम आतंकवाद की हो रही अय्याशी है और भ्रस्टाचारी हाथों-हाथ हेरा फेरी गटक रहा है | बस्ती-बस्ती,हस्ती-हस्ती यही नोटंकी यही नाटक है ना खिड़की ना दरवाजा और ना कोई फाटक है अपराधियों की चौपालों पे चल रही बैठक है | घर का भेदी लंका ढहा रहा है ना सोने का हार ना फांसी का फंदा समझ आ रहा है छाछ मक्खन पडोसी का कुत्ता खा रहा है घर का उल्लू बाहर ताक झाँक रहा है | विषयों में वीकट घिरा हुआ है युवा महिलाओं पे दिन दहाड़े हो रहा धावा जानते हुए भी अनजान बनते है वो जो चाट चाटकर खा रहे है मलाई मावा !           

उठो लल्लू दारु लाया कुल्ला कर लो

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                                    उठो लल्लू               अब आँखे खोलो                 दारू लाया                 कुल्ला कर लो           बीती रात बहुत चड़ाई          तुमने की ना रत्ती भर पढाई          एक्ज़ाम का वक्त है भाई         खोलो पोथी पुस्तक          २-४ आखर पडलो साईं            टॉप तो मार ना पाओगे           चिट नहीं बनाई तो            ...

मेरी जान-सर्च इंजन

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यु ट्यूब में नहाकर आई हो, या देसी ठर्रा पीकर आई हो,   गूगल गम खाकर आई हो, या कोलावेरी डी गाकर आई हो |                                याहू का सिर्फ यम्मी यकिन हो,                             या कामसूत्र की कमसिन हो,                           रेडिफ का रंगीन सीन हो,                          या दिल्ली मेट्रो की टाइमली ट्रेन हो |     जी मेल का जोशीला जी हो,    या जी-वन का जवाँ जी हो,   हसीन हॉट-हॉट फीमेल हो, या जुर्म की तिहाड़ जेल हो |  ...

जाने किस बरसात,बुझेगी मेरी प्यास

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उसकी याद दिलाती हे , उसका चेहरा बताती हे, मंद-मंद बहते हुए यूँ गुनगुनाती हे उसका नाम, ये ढलती हुई शाम | उसके प्यार का विश्वाश दिलाती हे, उसके प्यार का एहसास दिलाती हे, चोरी-चोरी,चुपके -चुपके यूँ मुजको सुनाती हे उसका पैगाम, ये ढलती हुई शाम | धीरे-धीरे से ढलती जाती हे, उसका हर हाले दिल सुनाती हे, कभी मै ना मिलूं उसको तो   यूँ  मचा देती हे भयंकर कोहराम, ये ढलती हुई शाम | किरणों में उसकी आँखे चमकती हे, हर तरफ सिर्फ उसकी झलक छलकती हे, ऐसे -वैसे बलखाती,लहराती यूँ मेरे दिल को देती हे सुकून-ओ-आराम, ये ढलती हुई शाम | मुज पर शबनम-सी छा जाती हे, मुझे अपने में समाँ लेती हे , हर घड़ी हर पल हर लम्हा यूँ उसकी मोहब्बत का पिलाती हे जाम, ये ढलती हुई शाम |

उन्हें मोहब्बत क्या हुई,वो इठला कर चलने लगे

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                 उन्हें मोहब्बत क्या हुई             वो इठला कर चलने लगे    खुद को सजाने संवारने में              आइनों पे आईने बदलने लगे                        अब आसमां में चाँद भी देखो            सोच समझ कर निकलने लगे      उन्हें मोहब्बत क्या हुई               वो इठला कर चलने लगे |                     फक्र नहीं ये फ़िक्र की बात है  कि अब दीवाने-परवाने उन पर    बेइनतहां बेख़ौफ़ मचलने लगे      ...