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परछाई,महबूबा यूँही नहीं तुम पर मरेगी

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एक दिन परछाइयां जरुर बोलेगी, अनल बर्फ के आंसू जरुर घोलेगी, समीर को न गिला न शिकवा होगा, ना बदरिया का कोई सिलसिला होगा |   जब ये कायनात डग - मग डोलेगी , फुर से चिड़िया दाना चुगकर, खुले आसमां में छम - छम तेरेगी , तुम ताकते रहना नदी किनारे, मछली सारे रजिया के राज खोलेगी | कलियों की कहानी पुरानी हो गई, अब गलियों में जवानी दीवानी हो गई, शबनम से अब हाला नहीं भरेगी, शराबियों से अब शराब नहीं डरेगी | तुम आइना क्यों देखते हो- महबूबा युहीं नहीं तुम पर मरेगी, थोड़ी घड़ियाँ थामकर चलो यारों, इनकी कदम - कदम पर जरुरत पड़ेगी | एक दिन परछाइयां जरुर बोलेगी, अनल बर्फ के आंसू जरुर घोलेगी 

तू जिंदगी ना सही,तेरा एहसास हमेशा साथ रहेगा !

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देखो फिर आँखों में नमी - सी छा गई है , वो सूरत जो आँखों से ओझल हुई नहीं कभी , वो यादें जो ख्यालों से दूर गई नहीं कभी , आज वो चुपके से फिर ख़्वाबों में आ गई है , ऐ खुदा जो न चाहा मैंने वही तुने मुझको दिया , जिसमे तुझको देखा मैंने वही तुने छीन लिया , शिकायत नहीं तुझसे ये इल्तजा रह गई है , जैसे जिन्दगी जहां अब थमी - सी रह गई है , बस जिन्दगी में उसकी कमी - सी रह गई है ,,,,,,,,Pancho